Thursday, January 6, 2011

आन बान शान वाले मुहम्मद हसन

ज़ुबैर रज़वी

(जन्म: मुरादाबाद, 1926--निधन: दिल्ली, 2010)
जब कोई अदीब हमारे दरमियान से उठ जाता है तो अमूमन समाजी रवैया यह होता है कि उसके बारे में लिखके या बोलते हुए उसके किरदार की खामियों, कमज़ोरियों को नज़रंदाज़ करते हुए वो खूबियां उसकी ज़ात से वाबस्ता कर देते हैं जो उसके किरदार और ज़ात का हिस्सा थीं ही नहीं। उसकी रस्मी तारीफों के पुल बांधने वाले ये वो लोग होते हैं जो ऐसी शोकसभाओं में सबसे पहले आते हैं और सबसे पहले शोक के दो चार आंसू बहा के सभा से बाहर चले जाते हैं। अभी जब 24 अपै्रल 2010 को मुहम्मद हसन का जनाजा़ दिल्ली गेट के कब्रिस्तान में दफनाने के लिए लाया गया तो ये अंदाजा़ लगाना मुश्किल न था कि अभी हाल के वर्षो में कुर्रतुल-एन -हैदर और उनके बाद वफात पाने वाले अदीबों के जनाज़े में शरीक लोगों की तदाद के मुकाबले मुहम्मद हसन को दफनाये जाने के वक्त़ दिल्ली के सबसे ज़्यादा अदीब और उस्ताद व उनकें शागिर्दों का एक बड़ा हल्का मौजूद था। ये उस वक्त़ था जब मुहम्मद हसन एक अर्से से गोशादीद थे और अपनी अदबी सरगर्मियों का एक लंबा सफर बामानी अंदाज़ में तय करके वो उर्दू की मनसबदारियों के लिए जोड़ तोड़ करने वाले औसतियों की अदबी बाज़ीगरी और करतबों के खामोश तमाशाई बन गये थे।
मुहम्मद हसन के इंतकाल के कुछ दिनों बाद दिल्ली से प्रकाशित होने वाली तीन साहित्यिक पत्रिकाओं, ऐवाने उर्दू, अदबी दुनिया, उर्दू आजकल, ने अपने सरे वर्क़ पर और अंदरूनी सफात पर उनकी यादगार तस्वीरें शाया करते हुए उन पर दो दर्जन से ज़्यादा ताज़ा मज़ामीन शाया किये। उर्दू आजकल ने अपना जुलाई का पूरा शुमारा ही मुहम्मद हसन की अदबी सरगॢमयों के लिए ही मख्सूस कर दिया है। जो लोग मुहम्मद हसन के अदबी रवैयों और नज़रियात और उनकी हमाजेहत तहरीरों से अच्छी तरह वािकफ न होकर महज़ सरसरी जानकारी रखते रहे थे उनके लिए भी और उनके लिए भी जो उनके अदबी सरोकारों से अच्छी तरह वािकफ थे इन तीनों रिसालों में शामिल मज़ामीन में मुहम्मद हसन का जो अदबी और तख्लीकी सरापा है वो किसी रगोंरोगऩ और लीपापोती के बगैर पूरी शफ्फाफियत के साथ उभर कर सामने आया है। उन्होंने अदबी सियासत नहीं की, वो जोड़तोड़ और उर्दू इदारों पर कब्ज़ा करने और उन इदारों को अपनी अदबी सल्तनत की तौसी के लिए इस्तेमाल करने की कोई शतरंज नहीं खेली। वो मसलेहतसाज़ी को बुरा समझते थे। अपनी सच्ची और कड़वी बात बरमला कहने में झिझकते नहीं थे। माकर््िसज़्म को अपने लिए और इंसानियत के लिए एक रहनुमा निज़ामे फिक्र तस्लीम करते थे। तनकीद में वो समाजियाती ज़ाबिये पर इसरार करते थे और तहज़ीबी तारीख को अपनी तनकीद की बुनियाद समझते थे। वो नुमोदोनुमाइश से बचते रहे और जहां जहां उनकी सलाइयतों और काबिलियत ने उन्हें पहुंचाया वहां उन्होंने लगन, खुलूस और अटूट कमिटमेंट के साथ एक बड़े तनाजुर में अदब और ज़बान की तौसी और फरोग के लिए काम किया। मुहम्मद हसन के जिस्मोजान, उनकी सोच, उनका सारा ज़हनी अमल अपने खरेपन की बिना पर साफ साफ झिलमिल करता नज़र आता था।
मुहम्मद हसन को अमूमन मजनूं गोरखपुरी, आले अहमद सुरूर, एहतेशाम हुसैन और मुमताज़ हुसैन जैसे तरक्कीपसंद नक्कादों के फौरी आने वाले उर्दू आलोचकों की नयी नस्ल में गिना जाता था। और यह समझा जाता था कि वो अपने से पहले की उर्दू आलोचना को माक्र्सी नुक्तेनज़र से रौशन करने वाले तरक्कीपसंद नक्कादों के विचारों की तौसी करने वाले नक्काद हैं। मुहम्मद हसन ने आलोचना के अलावा रचनात्मक साहित्य की मुख्तलिफ विधाओं जैसे शायरी, नावेल, अफसाना पर भी तवज्जो दी। इसके अलावा ड्रामों में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी, उनके पास करीबी दोस्तों ने लखनऊमें मुहम्मद हसन के अदबी शबोरोज़ का एहाता करते हुए काफी कुछ दिलचस्प पैराये में लिखा है। शारिब रुडौलवी ने 'मुहम्मद हसन को आखिरी सलाम’ में लिखा है :
उनके आने की खबर लखनऊ में जंगल की आग की तरह फैल जाती थी और उस वक्त़ के तमाम नौजवान अदीबोशायर और यूनिवर्सिटी के तल्बा उनके पास पहुंच जाते थे। उनमें कमर रईस, इकबाल मजीद, आबिद सुहैल, रतन सिंह, आगा सुहैल, मंज़र सलीम, शौकत उमर लखनऊ के तरक्कीपसंद शायर और स्टूडेंट्स फेडरेशन के नौजवान सब जमा हो जाते थे और कभी यह भी नौबत आ जाती थी कि बैठने को जगह नहीं रह जाती थी। उनके साथ नौजवान दोस्तों की गुफ्तगू का महवर अदब, शायरी, ड्रामा या फिर सियासत और माॢक्सज़्म होता-- उनके आने से जैसे ज़हन में दरीचे खुल जाते थे, एक नयी तवानाई के साथ हम सब के कलम चलने लगते थे।
मुहम्मद हसन एक मुस्तरिब हिस्सियत के मालिक थे। वो हमेशा कुछ न कुछ नया और सब के लिए खासतौर से उर्दू के लिए ऐसा कुछ करना चाहते थे जो उर्दू को और उसकी पढ़ाई लिखाई को समाज और बदलते हुए हालात से हमआहंग रख सके। वो लखनऊ, अलीगढ़, कश्मीर और दिल्ली की यूनिवर्सिटियों से वाबस्ता रहे और हर जगह उन्होंने उर्दू शोबे को अपने ज़माने के आधुनिक और नये तकाज़ों से वाबस्ता रखने के लिए ज़मीन हमवार की और फज़ा बनायी। जे एन यू उनकी तदरीसी सरगर्मियों की आखिरी पड़ाव था, वहां वो 1974 से 1991 तक उर्दू पढ़ाते रहे। इस अरसे में मुहम्मद हसन का तमाम तवज्जो फिक्र जे एन यू के उर्दू शोबे को एक मिसाली शोबा बनाने की रही। मुहम्मद हसन की कोशिशों से जे एन यू उर्दू-हिंदी का मुश्तरका शोबा हिंदुस्तानी ज़बानों का मरकज़ कायम किया गया। दोनों ज़बानों को पढऩे वालों के लिए एक दूसरे की ज़बान और उनके दरमियान तख्लीकी और लिसानी रिश्तों को मुतारिफ कराने का कोर्स भी शुरू किया गया था ताकि उर्दू-हिंदी के दरमियान किसी टकराव के पनपने का मौका न मिले। इसके अलावा, यूनिवर्सिटी के तल्बा में हिंदुस्तानी अदब और उसकी रवायत का इरफान कराना भी मुहम्मद हसन की सोच का एक हिस्सा था। उनकी शिख्सयत का बेहद रौशन पहलू यह था कि वो हिंदी और उर्दू के तख्लीकी़ अदब को एक बड़े फिक्री तनाज़ुर में रखकर उसका मुताला करने पर इसरार करते थे। वो नज़री और अमली तनकीद में यकीन रखते थे। इसकी कुछ झलक उनकी किताब, हिंदी अदब की तारीख में भी मिल जाती है। वो उर्दू के पहले नक्काद हैं जो तहज़ीबी तारीख को अदबियात के मुताले के लिए एक ज़रूरी कड़ी समझते हैं। इस सिलसिले में उनके पी एच डी के मकाले, 'उर्दू अदब- शाहाने अवध के दौर में’, और उनके दो और मकाले, 'उन्नीसवीं सदी में शुमाली हिंद के अदब के फिक्री असालीब, 'उर्दू अदब में रूमानवी तहरीक और दिल्ली की उर्दू शायरी का तहज़ीबी और फिक्री पसमंज़र (अहदे मीर तक)’ काबिले गौर हैं। उनकी ये ऐसी नुमाइंदा तहरीरें हैं जो तहज़ीब और तारीख के सिलसिले में उनके नुक्ते नज़र को रौशन करती हैं। मुहम्मद हसन का मुताला वसी था। वे बड़े साफ सुथरे अंदाज़ में किसी नज़री कन्फ्यूज़न के बगैर अदबी मबाहिस पर अपने ज़ाबिये से मुदल्लल गुफ्तगू करते थे। उनकी कोशिश होती थी कि वो मबाहिस को उलझाये बगैर उन्हें शफ्फाफियत के साथ कारीं पर वाज़े कर दें। उर्दू अदब की समाजियाती तारीख उनकी एक बेहद अहम किताब है। वो अपने एक मज़मून में लिखते हैं :
हम अदब के घरौंदे अलग से बना कर कितने ही खुश क्यों न हो लें, मगर ये सारे घरौंदे बनते हैं पूरे अदबी मआशरे की अक्कबी ज़मीन पर। यह अलग बात है कि उस अक्कबी ज़मीन का रंग यहां कुछ और दिखायी देता है, मगर यह हमारे दौर, हमारे ज़माने और हमारे मआशरे की ही ज़मीन है। (तर्जे खयाल, पृ. 180)
मुहम्मद हसन की तन्कीदी सोच और शऊर की यह खूबी सबने तस्लीम की है कि वो किसी भी अदबी रुझान के मारूज़ी तजजि़ये के हक में थे। उनका कहना था कि हर निज़ाम अपना निज़ाम अपने साथ लाता है। उसका फलसफा, उसका साहित्य, उसका आर्ट, उसकी समाजी तरबियत से हमआहंग होता है। मुहम्मद हसन किसी भी अदबी सोच की एक मरकज़ पर गर्दिश करते रहने के हक में नहीं थे। वो खयाल और सोच में तौसी और तब्दीली के खायफ नहीं थे और न उससे 'एलर्जिक’ थे। इसके बरिखलाफ वो तन्कीद के इम्कानात और मुताले की आदतों में तब्दीली लाने के हक में थे। इसलिए मुहम्मद हसन माक्र्सी नक्काद होते हुए भी कारीं के एक बड़े हलके के लिए अपनी मस्कूरा सोच की बिना पर काबिले कबूल रहे थे। इसका बड़ा सबब अपने ज़माने के तख्लीकी और फिक्री ज़हन रखने वालों के साथ उनका मुसल्सल तबादला-ए- खयाल करने का मन रहता था।
यह शायद 1958 के आसपास का ज़माना था, उनकी नयी नयी शादी हुई थी, मैं श्रीनगर के एक मुशायरे में और वो अपनी दुलहन, रौशन आरा बेगम, के साथ हमारी ही बस में हमसफर थे। हम एक दूसरे से वािकफ नहीं थे, मगर नये ब्याहता जोड़े को जहां जहां बस ठहरती और मुसाफिर उतरते उन्हें ज़रूर देखते। वो मुशायरे में नज़र नहीं आये, और आते भी क्यों, वो तो कश्मीर हनीमून के लिए आये थे।
मुहम्मद हसन की सरगर्मियों का ज़्यादातर मरकज़ यूनिवर्सिटियां और शोबे थे जहां उनका तक़र्रुर होता रहा था । वो जब दिल्ली आये तब मैं आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस में था, जहां सलाम मछलीशहरी भी थे। वो मुहम्मद हसन के बेतकल्लुफ और करीबी दोस्तों में थे। मुहम्मद हसन टॉक रिकार्ड कराने आते और सलाम के साथ चेक लेकर रीगल बिल्डिंग की एक दुकान पर कैश करा कर कनाट प्लेस की गलियों में नाओनोश के लिए गुम हो जाते थे। रफ्ता रफ्ता मुहम्मद हसन से अदबी गुफ्तगू भी होने लगी। मैंने जब अपना और अपने एक दोस्त नसीर खां का ज़रे सालाना उनके रिसाले,असरी अदब, के लिए मनीआर्डर से भेजा तो मुहम्मद हसन बहुत खुश हुए थे। वो असरी अदब से बहुत लगाव रखते थे और जो उसकी तौसी में हिस्सा लेता उसको मेहरबान नज़रों से देखते। उस वक्त मुहम्मद हसन की इल्मियत के बड़े चर्चे थे। मगर यह मेरी आवारागर्दी का ज़माना था, जब सज्जाद ज़हीर जैसी कद्दावर शिख्सयत ने दस्ते मेहरबां रखा, तो दिल्ली के नौजवान अदीबों का रवैया मेरे इसरार पर थोड़ा बदला और उस वक्त़ के सभी लिखने वाले अंजुमन तरक्कीपसंद मुसन्निफीन के जलसों में आने लगे थे। काफी हाउस में बैठकर अदब पर गरम गरम बहस करने वाले नौजवान अदीबों को खुशी हुई थी कि सज्जाद ज़हीर ने अंजुमन तरक्कीपसंद मुसन्निफीन के जलसों को मुनिक्कद करने की जि़म्मेदारी मुझे सौंपी थी। मुहम्मद हसन से मेरी फिक्री कुर्बत और किसी कदर अपनाइयत का ज़माना वह था जब मैंने उर्दूू ड्रामे पर काम शुरू किया। मुहम्मद हसन का एक ड्रामा ज़हाक काफी मशहूर हुआ था, वो रेडियो के लिए भी बहुत से ड्रामे लिख चुके थे। गालिब पर उनके दो ड्रामे, तमाशा और तमाशाई और कोहरे का चांद, मैने अपनी किताब तमाशा मेरे आगे, में शामिल किये थे जिसमें दिल्ली में कामयाबी से स्टेज हुए सात ड्रामों के टैक्स्ट भी थे। अपनी लंबी भूमिका में मैंने मुहम्मद हसन के गालिब पर लिखे ड्रामों को सराहते हुए यह लिखा था :
मुहम्मद हसन के ड्रामे तमाशा और तमाशाई में गालिब की बंटी हुई शिख्सयत का बड़ा पुरदलील मुहासिबा है। उसमें कई सीन उनके ड्रामे, कोहरे का चांद से फ्लैशबैक के तौर पर लिये गये हैं। इन टुकड़ों ने ड्रामे में मिर्जा नौशा और गालिब के दरमियान सवालो जवाब, तज़ाद और टकराव वाले मुकालमों में ज़ोर पैदा कर दिया है। मुहम्मद हसन वाहिद ड्रामानिगार हैं जिन्होंने हयाते गालिब और गालिब के अहवाल कवायफ पर दो अलग अलग ज़ाबियों से ड्रामे लिखे, तमाशा और तमाशाई, दर असल, उनके अपने ही ड्रामे, कोहरे का चांद की तौसी है। सैयद मेंहदी, सुरेंद्र वर्मा और मुहम्मद हसन ऐसे तीन ड्रामानिगार हैं जिनके गालिब पर ड्रामे मेरे खयाल में सब में अच्छे ड्रामे हैं।
शायद इसीलिए मुहम्मद हसन के गालिब पर लिखे ड्रामों की गूंज मेरी मुरत्तिबा उर्दू ड्रामे की दूसरी एंथोलाजी में भी सुनायी देती है। इसका इल्म मुहम्मद हसन को होता रहा और वो अपने ड्रामों पर गुफ्तगू करने के बजाय इस बात से खुश होते थे कि मैंने उर्दू ड्रामों के मज़मुई तौर पर 47 टैक्स्ट उर्दू पढऩे वालों को किताबी सूरत में फराहम करके उर्दू ड्रामों के लिए फज़ासाज़ी का बड़ा काम किया और यह साबित कर दिया है कि आज़ादी के बाद उर्दू ड्रामा खत्म नहीं हुआ, बल्कि वह और ज़्यादा तवानाई के साथ स्टेज पर खेला जाता रहा है। मुहम्मद हसन एक अरसे तक जनवादी लेखक संघ के सदर भी रहे, और जब मैंने जनवादी लेखक संघ से वाबस्तगी अिख्तयार की तो वो खुश थे। साहित्य अकादमी और दूसरे इदारों को ज़ाती मफाद के लिए इस्तेमाल करने की धांधलियों के खिलाफ जो जनवादी लेखक संघ ने तहरीक चलायी, उसे मुहम्मद हसन ने हमेशा कद्र की निगाह से देखा, मेरे रिसाले ज़हने जदीद को पढ़ते हुए उन्होंने एक बार बहुत ही दिलचस्प जुमला कहा था, 'आप मेरी सोच की परछाईं हैं।’
मुहम्मद हसन अपनी जि़ंदगी में और मरने के बाद भी उसी रंगरूप में नज़र आ रहे हैं जो उनका कुदरती रंगोरूप था। वो सच्चे और खरे अदीब थे। मसलहतों और जोड़तोड़ से बिल्कुल अलग और अपनी सोच और फिक्र के उन किनारों पर रहना पसंद करते थे जहां पर उछाल भरता हुआ पानी उन्हें कुछ करने के लिए मुस्तरिब रखता था।

अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग व अल्पसंख्यक वर्गों के लिए शिक्षा,,,, मज़हर हसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली

अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग व अल्पसंख्यक वर्गों के लिए शिक्षा
मज़हर हसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली

भारत, धर्म, जाति, उप जाति के आधार पर कई समूहों में बँटा हुआ है। देश में सामाजिक वर्गीकरण की जड़ें बहुत गहरी है। इससे देश में जाति आधारित हिंसा तथा उच्च वर्गों द्वारा निम्न जातियों पर अत्याचार की घटनाएँ हमेशा घटती रहती है। संविधान निर्माताओं, जिसमें डॉ. बी. आर. आम्बेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, ने एक रचनात्मक कार्य नीति या आरक्षण नीति का प्रतिपादन किया। ताकि देश के पारंपरिक जाति व्यवस्था के दुष्प्रभाव को कम किया जा सके और स्वतंत्रता एवं शिक्षा के अधिकार से वंचित लोगों को वे सुविधाएँ मुहैया कराई जा सकें।
कुछ तथ्य
1921- मद्रास प्रेसीडेंसी ने गैर-ब्राह्मण समुदाय के लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान किया।
1935 – भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने एक संकल्प पारित किया जिसे पूना समझौता कहा जाता है। इसमें कमजोर वर्गों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान किया गया।
1942 – डॉ. बी. आर. आम्बेडकर ने अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ की स्थापना की ताकि अनुसूचित जातियों को आगे बढ़ाया जा सके। उन्होंने सरकारी सेवा और शिक्षा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की माँग की।
1947 – भारत को आजादी मिली। डॉ. आम्बेडकर को भारतीय संविधान की मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान में जाति, धर्म, रंग, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाई गई। परन्तु सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करते समय संविधान में “सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग की उन्नति” के लिए आरक्षण का विशेष प्रावधान किया गया है। अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए संविधान में 10 वर्षों के लिए (जिसे संवैधानिक संशोधन द्वारा प्रत्येक 10 वर्षों के लिए बढ़ाया जा रहा ) अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान किया गया है।
1979- मंडल कमीशन की स्थापना की गई ताकि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का मूल्यांकन किया जा सके। कमीशन के पास पिछड़े वर्ग की उप-जाति के लिए तथ्यपरक आँकड़े उपलब्ध नहीं है। पिछड़े वर्ग की जनसंख्या आँकड़े के लिए आयोग 1930 के जनगणना रिपोर्ट का प्रयोग कर रहा है। इसके अनुसार इस वर्ग की संख्या कुल जनसंख्या का 52 प्रतिशत है तथा इसके अंतर्गत 1257 जातियाँ पिछड़े वर्ग के अंतर्गत चिह्नित की गई है।
1980 में आयोग ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की और वर्तमान कोटा में बदलाव लाते हुए इसे 22 प्रतिशत से बढ़ाकर 49.5 प्रतिशत तक करने की सिफारिश की। वर्ष 2006 में पिछड़े वर्ग की सूची में जातियों की संख्या बढ़कर 2279 तक पहुँच गई जो मंडल कमीशन द्वारा तैयार सूची से 60 प्रतिशत अधिक है।
1990 - सरकारी नौकरियों में मंडल कमीशन की सिफारिशों को क्रियान्वित किया गया।
1991 - उच्च वर्ग की जाति के लोगों के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने 10 प्रतिशत अलग आरक्षण व्यवस्था का प्रारंभ किया।
1992- अन्य पिछड़े वर्ग के लिए प्रस्तावित आरक्षण को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगित किया।
1998- केन्द्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समूह की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को आँकने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण आयोजित किया।
2005 में 93वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से निजी शैक्षणिक संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के लिए आरक्षण को सुनिश्चित किया गया है।
2006 में केन्द्र सरकार के उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावदान किया गया। इस तरह संपूर्ण आरक्षण 49.5 प्रतिशत तक पहुँच गया।

अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग व अल्पसंख्यक वर्गों के लिए शिक्षा मज़हर हसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली

Wednesday, December 15, 2010

ACHCHI NAHI YE BAAT – NADEEM SARWAR

ACHCHI NAHI YE BAAT – NADEEM SARWAR

Efforts: Kamberali J Shamji (kamsham@adelphia.net) http://www.ziaraat.com

Ahoor ki shab haye, sakinaa ka wo ronaaaa
Aur sayyadayyyy, mazloom ka betiii se yeh kahenaaaa
Are tu royayyy, mai ye dekh nahiiii, sakta sakinaaaa
Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii - M
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Kyaa howay kisi shabaa ko jo hum, ghar mein na ayayy
Tum humko na paaon, tumhay hum, bhi nahi payayyy
Tadpongi nahi darda say waada, karo bibiiii
Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Aaray baitha karo kuch dair charaa, ghon ko bujhaakarrr
Samjha karo is khaaq ko aaii, laadli bistaarr
Baali kabhi yun hi, nahi pahayna karo bibiiii
Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bibi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bibi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Aaray kuch dair ko ye farza karo, hum na rahay garrr
Baaqi na rahay haath koii, rakhnay ko sar parrr
Mahaul yateemon, ka bhi, sochaa karo bibiiii
Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bibi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bibi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Aadat zaraa tanhaii mein raha, nay ki bhi daalo
Tasveer tasawwoor mein asee, ri ki bana lo
Azaad parindon, ko na dekhaa karo bibi
Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bibi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bibi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Aaray asghaarr ko na manoos karo, pyaar say apnayyyy
Akbar kay urusee kay na de,khaa karo sapnayyyy
Sughraa kay qareeb it,naa na baithaa karo bibiii
Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Aaray zindaan say Rehaan sadaa, aati hai aqsaarrrr
Jaisay kay sakinaa, say yeh far,maatay ho sarwaarrr
Aab darr say laeenon kay na jaaga, karo bibiii
Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi
(Paheloo mein kabhi maa kay bhi so, yaa karo bi bi)
(Achchi nahi ye baat, na roya karo bibiiii)

Top most Nauha By Nadeem Sarwar
Witten By Rehan Azmi

Friday, November 19, 2010

प्रधानमंत्री सशक्त और ईमानदार हो-किरण बेदी, इंटरव्यू ,-भीका शर्मा और गायत्री शर्मा


प्रधानमंत्री सशक्त और ईमानदार हो-किरण बेदी,
इंटरव्यू ,-भीका शर्मा और गायत्री शर्मा
बुद्धि, कौशल हर चीज में किरण लड़कों से कम नहीं। 'लोग क्या कहेंगे' इस बात की किरण ने कभी भी परवाह नहीं करते हुए अपनी जिंदगी के मायने खुद निर्धारित किए। अपने जीवन व पेशे की हर चुनौती का हँसकर सामना करने वाली किरण बेदी साहस व कुशाग्रता की एक मिसाल हैं, जिसका अनुसरण इस समाज को एक सकारात्मक बदलाव की राह पर ले जाएगा। 'क्रेन बेदी' के नाम से विख्यात इस महिला ने बहादुरी की जो इबारत लिखी है, उसे सालों तक पढ़ा जाएगा।

हमने की खास मुलाकात किरण बेदी जी के साथ।

प्रश्न : जब आप आईपीएस चुनी गईं तब समाज में महिलाओं का पुलिस सेवा में जाना अच्छा नहीं माना जाता था। क्या आपको परिवार की ओर से इस तरह की कोई दिक्कत पेश हुई?

उत्तर : परिवार अगर विरोध करता तो शायद मैं इस पोजीशन तक नहीं पहुँच पाती। किरण बेदी अपने परिवार का ही प्रोडक्ट थी परंतु यह सच है कि उस समय महिलाओं का पुलिस सेवा में जाना समाज की दृष्टि में ठीक नहीं माना जाता था।

प्रश्न : आपकी सफलता में आपके पति का कितना योगदान रहा?

उत्तर : मेरे पति का मेरी हर कामयाबी में भरपूर योगदान रहा। मेरी हर सफलता को वे अपनी सफलता मानते हैं।


स्वयंसेवी संस्थाएँ जुड़े

जो हमने तिहाड़ जेल में किया वो देश की हर जेल में हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि स्वयंसेवी संस्थाओं को इस कार्य में जोड़ा जाए। जितनी ज्यादा स्वयंसेवी संस्थाएँ इस पुनीत कार्य से जुड़ेंगी उतना ही अधिक सुधार होगा

प्रश्न : आपकी कचहरी के माध्यम से जनता से सीधे संवाद करने का आपका अनुभव कैसा रहा?

उत्तर : इस कार्यक्रम के माध्यम से हमें एक सामाजिक जरूरत का पता लगा कि आज देश को ऐसे ही फोरम की जरूरत है। वो चाहते हैं कि कोई तुरंत न्याय वाले माध्यम से उनकी कोई मदद करे। ऐसा कोई फोरम हो जिसमें एक ही सुनवाई के भीतर लोगों को त्वरित न्याय मिले। आज यह कार्यक्रम लोगों को न्याय दिलाने का एक माध्यम बन रहा है।

प्रश्न : क्या आपको ऐसा लगता है कि भारतीय न्याय प्रणाली की सुस्तैल व्यवस्था के कारण कई वर्षों तक न्यायालयों में ही प्रकरण लंबित पड़े रहते हैं और लोग न्याय की गुहार करते-करते ही अपने जीवन का आधा समय व्यतीत कर देते हैं?

उत्तर : ये हकीकत है कि न्याय मामले लंबित हैं व न्यायालय में मुकदमों की सुनवाई में सालों लग जाते हैं। सीनियर ज्यूडीशरी ने भी इसे स्वीकारा है कि हमारे यहाँ अदालतों में बहुत एरियर्स हैं। लोगों को विश्वास नहीं है कि उन्हें न्याय मिल ही जाएगा। इसलिए वो दूसरे रास्ते ढूँढ़ते हैं और उनको कुछ मिलता नहीं है। कोर्ट में मुकदमे बहुत अधिक हैं व उनकी सुनवाई करने वाले जजों की संख्या बहुत कम है, इसीलिए तो वर्तमान में लोक अदालत की लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन आज भी बहुत सारी ऐसी बिजली अदालत और लोक अदालत की जरूरत है।

प्रश्न : जिस तरह से आपके प्रयासों से तिहाड़ जेल ‘तिहाड़ आश्रम’ में बदल गई, क्या आप मानती हैं कि आज देश की हर जेल को भी तिहाड़ जेल की तरह आश्रम बनाना चाहिए?

उत्तर : जो हमने तिहाड़ जेल में किया वो देश की हर जेल में हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि स्वयंसेवी संस्थाओं को इस कार्य में जोड़ा जाए। जितनी ज्यादा स्वयंसेवी संस्थाएँ इस पुनीत कार्य से जुड़ेंगी उतना ही अधिक सुधार होगा तथा कैदियों को शिक्षा के साथ स्वावलंबन के अन्य कार्यों का भी प्रशिक्षण मिलेगा। इससे उनकी आपराधिक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगेगा।


प्रशन : आज भी भारतीय महिलाएँ पिछड़ी हैं। उन पर अत्याचार हो रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण है?

उत्तर : उनकी परवरिश ठीक नहीं है। कहीं स्कूल दूर है तो कहीं उन्हें रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण नहीं मिल पा रहा है। वे जो पढ़ना चाहती हैं वह पढ़ नहीं पाती हैं। वे जो काम करना चाहती हैं कर नहीं पाती हैं। इस प्रकार वे मजबूर होघर कामकाज में ही अपनी सारी जिंदगी गुजार देती हैं। आज शादी ही भारतीय महिलाओं के जीवन का एक आधार है जो कि नहीं होना चाहिए। अगर शादी सफल हुई तो उनका जीवन अच्छा है अन्यथा बर्बाद है।


प्रश्न : आपके अनुसार देश का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए?

उत्तर : देश का प्रधानमंत्री ईमानदार और मजबूत होना चाहिए, लेकिन उसके पीछे मेजोरिटी भी होना चाहिए। अगर मेजोरिटी नहीं है या उस पर ऐसे गठजोड़ हैं जो हर चीज पर कभी हाँ और कभी ना करें तो वो सरकार क्या चलेगी। तो ये गणित नहीं है। यदि वो खुद ही असुरक्षित हो, उसके पास नंबर ही नहीं हो, गणित ही नहीं हो तो वो क्या करेगा। प्रधानमंत्री के पीछे आइडियोलॉजी और सशक्त पार्टी होना चाहिए।

प्रश्न : आपने राजनीति में रुचि क्यों नहीं ली?

उत्तर : क्योंकि मेरी इसमें रुचि नहीं है। पब्लिक लाइफ में मेरी रुचि शत प्रतिशत है, लेकिन पॉलीटिकल लाइफ में बिलकुल नहीं है।

ज्ञान पीठ मिलने के बाद शहरयार से इंटरव्यू

ज्ञान पीठ मिलने के बाद शहरयार से इंटरव्यू
आपने जब सुना कि ज्ञानपीठ पुरस्कार आपको मिलने जा रहा है तो, आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

काफी खुशी हुई। इतनी खुशी कि मैं लफ्जों में बयान नहीं कर सकता हूं। दरअसल हम जिस गंगा-जमुनी तहजीब से हैं, वहां ज्यादा गम और खुशी के लिए शब्द बने ही नहीं हैं, लेकिन निजी तौर पर यह मेरे लिए एक अहम उपलब्धि थी। इससे भी अहम कि बुढ़ाती उम्र के बावजूद मैं लगातार काम कर रहा हूं, जिसे सम्मान मिल रहा है।


आप शिक्षा क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। उर्दू, शेरो-शायरी की दर्जनों किताबें लिख चुके हैं। कई पुरस्कार आपको मिल चुके हैं। फिल्मों के लिए भी आपने गीत लिखे। इतने सारे काम, कैसा लग रहा है आपको?

लाजिमी तौर पर अच्छा ही लगेगा। करीब दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्ष 1957 से लगातार लिख रहा हूं। साहित्य अकादमी पुरस्कार, फिराक सम्मान और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी सम्मान और दिल्ली उर्दू अकादमी सम्मान मिल चुके हैं। आज भी लोगों की जुबान पर मेरे लिखे गीत हैं। हां, कभी-कभी बुरा तब लगता है जब फिल्मों के जरिये ही लोग मुझे जानने लगते हैं, लेकिन अपने आप में यह भी गर्व की बात है। इससे ज्यादा क्या चाहिए मुझे? देश ने, समाज ने काफी कुछ मुझे दिया है और मैं अपने आप से काफी संतुष्ट हूं। बहुत कम लोग जानते हैं कि आपका वास्तविक नाम कुंवर अखलाक मोहम्मद खान है। हां। मैं अपने उपनाम शहरयार से ही लोगों के बीच जाना जाता हूं। एकाध गजल मैंने उस नाम से भी लिखे हैं। कुंवर का तखल्लुस के तौर पर इस्तेमाल किया। कोई 1956-57 के आसपास मैं इसी तखल्लुस का इस्तेमाल करता था, लेकिन तब के जान-पहचान वालों ने कहा कि मजा नहीं आ रहा है। किसी ने कहा-यार नाम है कि इतिहास तो किसी ने कहा-गैर-शायराना नाम है। तब खलीलुर्रहमान आजमी जी, जिनका मैं काफी कद्र करता रहा, उन्होंने कहा कि कुंवर ही रहना है तो शहरयार रख लो। इसका भी मतलब राजकुमार ही होता है। बस मैंने तबसे शहरयार के नाम से लिखना शुरू कर दिया।

बचपन में गुजारे अपने वक्त के बारे में कुछ बताइए?

अब तो मोटा-मोटी बहुत कुछ याद भी नहीं रहा। वैसे भी याद तब ज्यादा आती है जब आपने बचपन में दुख-दर्द सहे हों। अल्लाह की दुआ से ऐसा कुछ भी नहीं था। ऐशो-आराम से बचपन गुजरा। पैसे की तल्खी कतई नहीं थी। फिर भी बचपन तो बचपन सा ही होता है। हम नंगे पांव घूमते थे। बागों में जाकर जमकर आम-ककड़ी खाया करते थे। मैं हॉकी का अच्छा खिलाड़ी था। आज जब दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेल हो रहे हैं तो मैं आपको बता दूं कि मैं काफी अच्छा एथलीट भी रहा। स्कूल-कॉलेज स्तर पर खूब नाम कमाए, लेकिन ये सब शौक के तौर पर ही रहा।

और आपने तालीम देने को आपना पेशा चुना, ऐसा करने की क्या वजह रही? कहां-कहां आपने नौकरी की?

जैसा कि मैंने बताया कि शौक के तौर पर मैं खेलता था। शौकिया तौर पर ही लिखना शुरू किया। इस ओर कैरियर बनाने के बारे में कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा। शायद यह उस वक्त का असर था। हमने देश की आजादी के बाद अपनी जिंदगी में रंग भरने शुरू ही किए थे। इसलिए कैरियर के सभी कोण हमारे सामने नहीं थे। समाज में भी उस वक्त एक कहावत थी- खेलोगे, कूदोगे बनोगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब। इसका भी असर था। बहरहाल अंजुमन-तहरीके उर्दू में साहित्यक सहयोगी के तौर पर काम करना शुरू किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्र्वविद्यालय में लेक्चरर का पद खाली था। वहां मेरा चयन हो गया। इसके बाद 1996 तक मैंने नौकरी की। बाद में उर्दू विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत हुआ और अब फिलहाल अलीगढ़ में ही गुजर-बसर हो रहा है।

शेरो-शायरी से जुड़े अपने परफॉर्मेस के बारे में भी कुछ बताइए

देखिए, इस मामले में मैं थोड़ा संकोची किस्म का रहा हूं। शुरुआती दिनों में पढ़ने की ख्वाहिश नहीं थी। सबसे पहला मुशायरा गुजरात के अहमदाबाद में किया। मेरे विचार से वह कोई 1961 का साल था। मेरी जमात में दो लोग और थे-एक बशीर बद्र भाई और दूसरे विमल कृष्ण अश्क। 1962-63 में लाल किले में भी एक बड़े मुशायरे का हिस्सा बनने का मौका मिला। इधर काफी अरसे से मैं मुशायरों में शिरकत करने लगा हूं और अब यह सब बहुत अच्छा भी लगता है।

फिल्म उमराव जान के लिए आपने गाने लिखे। कैसे मुमकिन हुआ?

मुजफ्फर अली उम्दा निर्देशक हैं। उन्हें ऐसे गीतों की जरूरत थी जो पटकथा को आगे बढ़ाए। यही नहीं वह अक्सर इस बात पर ज्यादा जोर देते कि संगीत पक्ष की मजबूती के अलावा गीत के बोल ऐसे लिखे होने चाहिए जिसके मायने हों। मेरी शेरो-शायरी की वह बहुत कद्र भी किया करते थे। बस हम-दोनों मिले और गाने बन गए। आज यह विश्र्वास नहीं होता कि ऐसे गाने बने जो 30 साल से गुनगुनाए जा रहे हैं। वरना मुंबइया फिल्मों के ज्यादातर गाने तो आज आए और कल गए वाले होते हैं।

आपके बारे में यह धारणा है कि आप फिल्मों के लिए लिखना नहीं पसंद करते हैं?

दरअसल, मैं किसी ऐसे फिल्म में गाने नहीं लिख सकता जिसमें गाना कहानी का हिस्सा न हो। एक बात और कि मैं बेहतर शब्दों के इस्तेमाल पर भी ध्यान देना पसंद करता हूं। इसके साथ समझौता नहीं कर सकता। अगर निकट भविष्य में उमराव जान की तरह की फिल्में बनेंगी तो मैं उसमें गाने जरूर लिखूंगा। दूसरी बात यह भी है कि मैं मुंबई में रहना पसंद नहीं करता हूं। मेरे लिए अलीगढ़ के खास मायने हैं। जो फिल्मकार मेरे पास आते हैं, यदि उनकी स्कि्रप्ट में दम होता है और गाना उसका हिस्सा होता है तो मैं उनके लिए लिखता हूं। आपको बता दूं कि उमराव जान के बाद मैंने कुछ और फिल्मों के लिए गाना लिखा। मुजफ्फर अली के अंजुमन के लिए लिखा। हब्बा खातुन ज़ुनी के गाने भी मैंने ही लिखे, लेकिन दुर्भाग्य से यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई।

आप शेरो-शायरी को काफी गंभीरता से लेते रहे हैं। इतनी गंभीरता कि आपने बॉलीवुड की चमक-दमक से भी समझौता नहीं किया, लेकिन साहित्य में इसे विशेष तवज्जो नहीं मिलती है। लोग इसे गम में डूबे हुए किसी शख्स की मर्शिया के तौर पर मानते हैं?

आपकी इस बात पर मुझे सख्त ऐतराज है। आज के दौर में भी शेरो-शायरी को गंभीरता से लिया जाता है। कद्रदानों की कमी नहीं है, बस देखने का फर्क बदल गया है। मुझे ज्ञानपीठ पुरस्कार अपनी उर्दू गजलों की वजह से मिला है। इससे पहले भी तीन उर्दू गजलकारों को यह पुरस्कार मिल चुका है। वरना साहित्य के क्षेत्र में गलत चयन पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। अब तक यह पुरस्कार मिलने को लेकर कोई टिप्पणी मीडिया में नहीं आई है। साफ है कि सबने मुझे इसका हकदार समझा। हां, अगर आप बेहतर शायरी लिखें ही नहीं और कहें कि मुझे गंभीरता से नहीं लिया जाता है तो क्या किया जा सकता है?

एक मसला यह भी है कि साहित्य के कई विधा हैं और हर विधा के अपने खास मायने हैं। अगर किसी विधा का जानकार यह मान बैठे कि दूसरे की विधा कमजोर या मजाक है तो इससे वह अपने साथ-साथ अपने विद्या की तौहीन भी करता है। इसका मतलब यह है कि आपके मुताबिक आज के दौर में अच्छा नहीं लिखा जा रहा है और पहले के दौर में अच्छा लिखा जाता था?

मैं किसी का नाम नहीं लूंगा, लेकिन आज भी अच्छे शायर हैं। हालांकि, अब वह दौर और हालात नहीं है। उस तरह के शब्द नहीं हैं। अगर हैं भी तो इसे समझने वालों की कमी है। जमाना ही भाग-दौड़ का है। दुख है कि बड़ी शायरी नहीं हो रही है। गद्य का बोलबाला है और फिक्शन हावी है, लेकिन अभी भी काफी संभावना है और बेहतर किया जा सकता है। इसके अलावा दूसरी बात यह भी है कि अगर अच्छा कुछ लिखा जा रहा है तो उसे मीडिया में जगह नहीं मिलती है। दरअसल नकारात्मक खबरें आज के समय में ज्यादा हावी दिखती है। इस वजह से हम लोग सिर्फ बुराईयां ही देख पा रहे हैं। जहां तक हमारे दौर की बात थी तो उस वक्त तो खराब लिखा ही नहीं जा सकता था। लोग उर्दू जुबान से ज्यादा वाकिफ होते थे। इससे भी ज्यादा गंभीर यह है कि अब बेहतर हिंदी भी खत्म होती जा रही है। कई शब्द ही प्रचलन से गायब होते जा रहे हैं। दूसरे हिंदी-उर्दू के सिमटते दायरे का असर भी आज के गजल पर पड़ा है। हमें इस बात की ओर ध्यान देना होगा कि अंग्रेजी संस्कृति हमारी शब्दों की विरासत को खत्म न कर दे।

भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं?

एक लेखक, कवि क्या कर सकता है? लिखना जारी रहेगा। अभी मुजफ्फर अली नूरजहां-जहांगीर पर फिल्म बना रहे हैं। उनके लिए मैं गाना लिख रहा हूं। एक बार फिर रुपहले पर्दे के जरिये मेरे गीत लोगों तक पहुंचेगा यानी मेरे अंजुमन में आपको आना है बार-बार। मैं लगातार आप सबके लिए बेहतर से बेहतर रचना लेकर आता रहूंगा

Monday, October 4, 2010

पर्दे के पार : मुस्लिम किरदार मज़हर हसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली

पर्दे के पार : मुस्लिम किरदार
मज़हर हसनैन ,जेएनयू नई दिल्ली
एक जमाना वो था जब मुस्लिम फिल्मों में हीरो को शायरी करते हुए और हीरोइन को पर्दे के दायरे में रहते हुए दिखाया जाता था। पुराने समय से आज तक मुस्लिम भारतीय फिल्मो में बहुत बदलाव आए हैं। हाल ही मे रिलीज फिल्म धोखा में मुस्लिम पुलिस ऑफिसर को मुंबई मे मुस्लिम आतंकवादियों के साथ जूझते हुए उसे किस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है यह दिखाया गया है। पूजा भट्ट ने इस फिल्म में इस बात को बखूबी बताया है कि जब भी बम ब्लास्ट की बात होती है तो सबसे पहले मुसलमानो पर ही शक क्यों किया जाता है। 'चक दे इडिंया' मे शाहरुख खान की भूमिका अभी तक लोगो के दिलों में ताजा है, जिसमे यह दिखाया गया है कि एक मुसलमान को किस तरह उसकी बेगुनाही का सबूत देना पड़ता है। इन दोनों फिल्मो में भारतीय मुस्लिम किरदार को खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए दिखाया गया है।
भारतीय मुसलमानों को टेलीविजन ने पिछले कुछ सालों में फिल्मो से अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से पेश किया है, फिर बात चाहे लुक की हो, पहनावे की हो या बात करने के अंदाज की। ऐसे ही कुछ धारावाहिक है अधिकार, जन्नत, शाहीन, नरगिस, रेहनुमा, तू नसीब है किसी और का और हिना, जिसे लोगों ने बड़े पैमाने पर सराहा है। समय के साथ-साथ मुस्लिम किरदारों की भूमिका मे बहुत परिवर्तन हुआ है। 50 और 60 के दशक में बनी भारतीय मुस्लिम फिल्मों में भारत और पाकिस्तान बनने के बाद भारतीयों की स्थिति और आतंकवाद को दर्शाया जाता था। इस समय बनी फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को जमींदार या संपन्न व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता था। धीरे-धीरे बॉलीवुड की फिल्मों में मुस्लिम किरदारों का रोल बदला है। 70 के दशक मे बनी फिल्मों में मुस्लिम किरदारों की भूमिका बदली हुई नजर आई। कमेंटेटर सैयद अली मुजत्बा के अनुसार उन दिनो बनने वाली फिल्मो में नवाबों को अपनी दौलत लुटाते और मुजरा करने वाली हीरोइन के साथ कोठों पर दिखाया जाता था, जैसे मेरे हुजूर, पाकीजा और उमराव जान। इसी दशक में मुस्लिम हीरो को अलीगढ़ कट शेरवानी में इकबाल या मिर्जा गालिब की शायरी करते हुए देखा जाता था। उन्हीं दिनों में हिंदू फिल्मों से सिनेमा जगत में जाति या वर्ग को लेकर किसी विशेष प्रकार का वातावरण नहीं दिखाई देता था।
1960 में मुस्लिमों का एक ऐसा सफल दौर रहा है, जब भजन गाने में भी मुसलमान आगे थे। जैसे मुस्लिम हीरो यूसुफ खान (दिलीप कुमार) ने मदिंर में एक भक्तिमय गीत गाया। इस गाने के संगीतकार थे शकील बदायूनी और इसे लिखा था साहिर लुधियावनी ने। इस गाने का संगीत नौशाद अली ने दिया और इसे मोहम्मद रफी ने गाया था। मुस्लिम सिनेमा पूरी तरह कलाकारों पर ही निर्भर नहीं रहा है। मुस्लिम संप्रदाय के अलावा अन्य धर्मों के निर्देशक जैसे सोहराब मोदी, गुरू दत्त और श्याम बेनेगल ने भी पूर्वी भारत में मुस्लिम फिल्मों के नए आयाम प्रस्तुत किए। सन् 1930 से भारतीय मुस्लिम फिल्मों ने सिनेमा जगत में धूम मचाई। फिल्मों के अतिरिक्त भारतीय सिनेमा जगत में जाने-माने संगीत निर्देशकों और गीतकारों ने भी मुसलमानों पर आधारित फिल्मों का सुपर हिट संगीत दिया है। 40 और 50 के दशक में संगीतकार नौशाद ने मुस्लिम फिल्मों में उत्तर प्रदेश के लोक संगीत और नवाबी अंदाज को जिस खूबसूरती के साथ पेश किया है, उसकी धुनें आज भी लोगों को गुनगुनाते हुए देखा जा सकता है। चाहे मुस्लिम डायलॉग ओर तहजीब को आज फिल्मों में कम देखा जाता हो लेकिन उस तहजीब की मिसाल आज भी दी जाती है जो पुराने समय की मुस्लिम फिल्मों की विशेषता हुआ करती थी। मुसिलम कल्चर को अभिनय के माध्यम से नई पहचान देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका दिलीप कुमार, मीना कुमारी, नरगिस, नसीरूद्दीन शाह, शाबाना आजमी, ने निभाइ है। उन्होंने अपने नए और अनोखे अंदाज से मुसिलम संस्कृति को जिस तरह व्यक्त किया उसकी छवि आज भी लोगों की स्मृति पटल पर कायम है। 70के दशक में मुसिलम फिल्मों ओर किरदारों का ऐक ऐसा समय आया जब चाहे मुस्लिम किरदारों ने उदू डायलॉग नहीं बोले हो लेकिन मुसलिम किरदारों ने हमेशा ईमानदारी के साथ सच्चे मुसलमान होने का सबूत दिया है। लेखक सलीम ओर जावेद ने उर्दू जबान को अपने डायलॉग में शामिल किया लेकिन लेखक और अभिनेता कादर खान के साथ विलेन के रूप में मशहूर अमजद खान ने अपनी खास स्टाइल से मुस्लिम फिल्मों को नई पहचान दी। कुली में अमिताभी बच्चन ने एक सच्च मुसलमान का किरदार बखूबी निभाया। फिर आने वाले अगले दौर में हिंदु और मुसलमानो को आपस में लड़ते हुए दिखाया गया जैसे चेतन आनंद की फिल्म हकीकत मे दिखाया गया ह। तब लोगो को एक विशेष प्रकार के नाम जैसे सकार्पियोन, मोंगेंबो और कैलेंडर आदि लुभाने लगे थे। उसके बाद बनने वाल फिल्मों में अमर, अकबर ओर एंथोनी का नाम शामिल हैं। इसी दशक में ऐसी कई फिल्में बनी जिसमे मुस्लिम हीरों को हिदु बहन से राखी बंधवातेहए या हिंदू मां से प्रसाद लेकर खाते हुए दिखाया गया। सन 1995 में मनी रत्नम द्वारा निर्देशित फिल्म बॉम्बे रिलीज हूई। इस फिल्म ने हिंदु मुसिलम के बीचों एकता की नई कड़ी को जन्म दिया। भारतीय समाज मे हिंदु मुसलमानों की छवि को नया रूप देने का श्रेय इसी फिल्म को दिया जाता है। फिल्म रोजा से जेहादी आतंकवादी और राष्ट्र भक्त के बीच प्रतिद्दिंता का पता चलता ह तो हाल के कुछ सालों में बनी फिल्म सरफरोश, गदर एक प्रेम कथा, मिशन कशमीर, बार्डर, फना ने मुस्लिमों की आधुनिक छवि को उजागर कियया है। इन फिलमों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि भारत मे रहने वाले मुसलमान अपने देश क प्रति उतने ही सच्चे ओर वफादार है जितना कि किसी ओर धर्म के लोग है।
सईद अख्तर मिर्जा को 90 के दशक में मुस्लिम फिल्मे बनाने ओर मुस्लिम तहजीब को अपनी फिल्मों के माध्यम से लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है। सईद अख्तर मिर्जा को 90 के दशक की फिल्मों में भारतीय मुस्लिम सिनेमा को जीवित रखने के लिए याद किया जाता है। मिर्जा ने उसी दौरान टेलीसीरियल नुक्कड़ के माध्यम से मध्यम वर्गीय परिवारों और उनकी समस्याओं को उजागर किया। इसी दशक में आने वाले कुछ और मुस्लिम धारावाहिकों के माध्यम से आम मुसलमानों की परेशानियों को समझाने की कोशिश की गई। उनके द्वारा निर्देशित फिल्म सलीम लंगड़े पर मत रो एक ऐसी ही फिल्म थी जिसके माध्यम से मुंबई में रहने वाले मुसलमानों की समस्याओं को प्रस्तुत किया गया है। इस फिल्म को 1990 में बेसट हिंदी फिल्म नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया।
जाने माने टेलीविजन निर्देशक संजय उपाध्याय कहते हे कि सन 1992 के बाद से मुसलमानों पर आधारित धरावाहिक के बनने में कमी आई है ओर हिंदुत्व को आधार बनाकर धारावाहिक बनने लगे है जिसमें संयुक्त परिवारों, मल्यों ओर त्योहारों को आधार बनाया गया है। सन 2000 से धारावाहिक सास बहू पर आधारित होकर अधिक बन रहे है जिसे लोगों ने बड़ी संख्या में पसदं किया है। आज हालत यह है कि पिछले त्त् सालों में कोई मुसिलम बेस्ड धारावाहिक नहीं बना है क्योकिं इस समय बनने वाले धारावाहिक पूरी तरह से महिलाओं पर आधारित है। इस समय चाहे मुसलमानों पर आधारित फि ल्मों और धारावाहिकों में पुरानी फिल्मों की तरह उर्दू अदब को भी नए रूप में आधुनिक तरीके के साथ पेश किया गया है। अब हीराइन परदे में नजर नहीं आती बल्कि वह भी आम हीरोइनों की तरह रहती है इसी तरह से उनके बोलने के अंदाज औश्र तौर तरीकों में आधुनिकता की झलक दिखाई देती हैै॥ सईद अख्तर मिर्जा क हते है कि भारतीय सिनेमा ओर भारतीय सभयता को मुस्लिम फिल्मों ओर किरदारों के बिना अधूरा कहा जाए तो गलत नहीं होगा।